शनिवार, 30 अगस्त 2025

दद्दा कात कछु न कइये

पानी छुओ सो उनने धुन दओ ,
दद्दा कात कछु न कइये।
कक्का जू ने चपटो कर दओ ,
दद्दा कात कछु न कइये।
दाऊ जू ने गल्ला धर लओ ,
दद्दा कात कछु न कइये।
उनकी भैंसन ने खितवा चर लओ ,
दद्दा कात कछु न कइये।
बड़े-बड़न ने मन को कर लओ ,
दद्दा कात कछु न कइये।
'परमा' कात के कब लो चल है ,
दद्दा कात कछु न कइये।

रविवार, 17 जुलाई 2016

मम्मा तुम न समझौ

कैसी लबरी शान, मम्मा तुम न समझौ।
जनता दे रइ प्रान, मम्मा तुम न समझौ।
चौरे चकरे गोला डर गए
नइयाँ गाड़ी-वान, मम्मा तुम न समझौ।
सूका परौ बितर दये पइसा
कक्कू खा गए पान, मम्मा तुम न समझौ।
डेओडी-डेओडी पानी मांगत
औंदे डरे किसान, मम्मा तुम न समझौ।
आरच्छन की न्याव मचा लई
दूषित छुओ पिसान, मम्मा तुम न समझौ।

रविवार, 20 सितंबर 2015

जो यहाँ न समाते हैं


कवित्त 

आते जो यहाँ हैं, नीचे तबके का दुख लिए,
हिन्दू के विचार में, वो मोल नहीं पाते  हैं।
भंजक बल फैलते हैं, एकता से खेलते हैं,
उन्ही को वो खींचते, जो यहाँ न समाते हैं।
खुद को जो हिन्दू कहें, निज में न माने इन्हे,
ये जो रुख मोड़ दें तो, घोर गरियाते हैं।
                                            -परमानंद  

शनिवार, 19 सितंबर 2015

पूत मेरा तारे संसार


कवित्त -

भोर में नहाते, झट भोर उठ जाते जो वो,
हुलस समाए मन, इसकूल जाते हैं।
कूदते हैं फांदते हैं, गार सब रांदते हैं,
कल की न जानते हैं, मौज वो उड़ाते हैं।
श्रम में जो आंचते हैं, वर्णमाला बाँचते हैं,
करम लिखे को पर, बाँच नहीं पाते हैं।

चौपाई -

सोलह साल उमरिया आई। लेकर तसला करो कमाई।
करजा की हो गई भरमार। पूत मेरा तारे संसार।

                                                               -परमानंद  

हुलस = उल्लास / प्रसन्नता, इसकूल = स्कूल, गार रांदना = ऊधम करना, पूत = पुत्र 

शनिवार, 20 जून 2015

नैनन की हुसियारी

आज लड़ी उनसे अखियाँ, सखियाँ बतियाँ कर जान निकारी। 
गागर आज भई हलकी, छलकी उमगी भरजोर हुलारी।  
बोल न बोल गए बलमा, बस नैनन तौल भई बनियारी। 
लूट गओ हम खों बनिया, कर नैनन की हलकी हुसियारी। 
                                                                         -परमानंद 

बनियारी = व्यापार, बनिया = व्यापारी 

शुक्रवार, 19 जून 2015

सपरावत खीझ परी महतारी

पृष्ठभूमि:- आज भी वो दिन याद आ जाता है जब अम्मा बचपन में नहलाती थी।
छंद:- मालती सवैया

धूसर अंग धरे करिया, बनियान तने मल सी कर डारी।
खेलत धूलि न भाँय करै, रत नाहिं घरै दिन-भोर-दुपारी।
बाप दुलार बिगार  दिए, न उसार करे बनवै अधकारी।
ऊ दिन खों अब याद करों, सपरावत खीझ परी महतारी। 

                                                                       -परमानंद 

धूसर = धूल से सने, तने = तूने, भाँय = होश, रत = रहता, उसार = सेवा, खों = को, सपरावत = नहलाती, महतारी = माँ 

गुरुवार, 18 जून 2015

सजनी अपनी यह है परपाटी

पृष्ठभूमि:- रोड का काम प्रारम्भ होते ही मजदूर समुदाय में आशा जाग उठी।
छंद:- मालती सवैया

रामपुरा अब रोड डरे, चल री चल खोद भरें कछु माटी।
काम करे कछु बात बने, अब भूखन जात न उम्मर काटी।
राज लगे उनखों जिनकी, धन दौलत है जन की बरबादी।
हाड़ गला नस खून बना, अपनी सजनी यह है परपाटी।

                                                                       -परमानंद

रामपुरा = एक गाँव का नाम, उनखों = उनको, हाड़ गला = हड्डियाँ गलाना