सवइया

 1 

आज लड़ी उनसे अखियाँ, सखियाँ बतियाँ कर जान निकारी।
गागर आज भई हलकी, छलकी उमगी भरजोर हुलारी।
बोल न बोल गए बलमा, बस नैनन तौल भई बनियारी।
लूट गओ हम खों बनिया, कर नैनन की हलकी हुसियारी।

2

धूसर अंग धरे करिया, बनियान तने मल सी कर डारी।
खेलत धूलि न भाँय करै, रत नाहिं घरै दिन-भोर-दुपारी।
बाप दुलार बिगार दिए, न उसार करे बनवै अधकारी।
ऊ दिन खों अब याद करों, सपरावत खीझ परी महतारी।

3

रामपुरा अब रोड डरे, चल री चल खोद भरें कछु माटी।
काम करे कछु बात बने, अब भूखन जात न उम्मर काटी।
राज लगे उनखों जिनकी, धन दौलत है जन की बरबादी।
हाड़ गला नस खून बना, अपनी सजनी यह है परपाटी।

4

आसुन आँस गई कतकी, रब ने सजनी अब बादर फारे।
जात किते अब खात किते, सनतान किते अब पालत बारे।
सूद बढ़ै दिन रात अरी, जनु चाँद बढ़ै रजनी उजियारे।
बीज बहाय लिए बरखा, सब नास कियो हरि पालनहारे।

5

बादर से हिम के पथरा, बरसे हिरदे जब मार कटारी।
चारउ ओर भई चपटी, फसलें झकझोर सपट कर डारी।
ढोरन गातन खून बहै, कछु चोटन से दिहिया तज डारी।
थारन मूड़ ढके दुबके, 'परमा' अब रूठ गओ गिरधारी।

6

खोरन ठोकर खात फिरै, ढुलकै-लुढकै नहि होस ठिकाने।
रंजित नैनन खून चढ़ो, पतलून धरे सब कीच भिड़ाने।
मारत, डारत तेल सखी, नहि लाज रखै सजना बरयाने।
देख सराब खराब बला, 'परमा' अनवास न भौत खटाने।


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