1
कैसी लबरी शान, मम्मा तुम न समझौ।
जनता दे रइ प्रान, मम्मा तुम न समझौ।
चौरे चकरे गोला डर गए
नइयाँ गाड़ी-वान, मम्मा तुम न समझौ।
सूका परौ बितर दये पइसा
कक्कू खा गए पान, मम्मा तुम न समझौ।
डेओडी-डेओडी पानी मांगत
औंदे डरे किसान, मम्मा तुम न समझौ।
आरच्छन की न्याव मचा लई
दूषित छुओ पिसान, मम्मा तुम न समझौ।
जनता दे रइ प्रान, मम्मा तुम न समझौ।
चौरे चकरे गोला डर गए
नइयाँ गाड़ी-वान, मम्मा तुम न समझौ।
सूका परौ बितर दये पइसा
कक्कू खा गए पान, मम्मा तुम न समझौ।
डेओडी-डेओडी पानी मांगत
औंदे डरे किसान, मम्मा तुम न समझौ।
आरच्छन की न्याव मचा लई
दूषित छुओ पिसान, मम्मा तुम न समझौ।
2
कुँवर साब की भई सगाई, गाँव के सबरे नर आ जइयो।
दाऊ साब ने दावत रखाई, अनिवार्य हो सब जें जइयो।
उते न आके उनकी बुराई, अपने मूड़ पे तुम धर लइयो।
पंडित-बामन सबरे जुर के, मंगल-मंत्र तना पढ़ दइयो।
ग्राम-पंचयात के सबरे टैंकर, दरवाजे पे झट धर जइयो।
प्रीतिभोज में बड़े प्रेम से, सातऊ जातें भोग लगइयो।
मैंतर, बसोर और चमार भाई, तना दूर हो तुम खा लइयो।
खबरदार ! जे तीनऊ जातें, खा के दोना दूर कर दइयो।
3
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।
नाते घरी भरे के लाने,
जे संग तोरे नई जाने;
आँखी मिंचत नज़र नई आने, माया को सबरो जंजाल।
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।
जो नित-नित होत पुरानो,
अरे,मरम न तेने जानो;
पिंजरा काये तोए मिठानो, जी में है नइयां सर-स्वाद।
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।
भीतर बैठी जोन चिरैया,
उको कछु भरोसो नइयां;
'परमा' मानत काये नइयां, भज ले बृजमोहन बृजलाल।
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।
4
आसों बाई खों पानी भरवो, जादा कार्रो पर गओ,
मैं होती तो भर देती।
आहा दइया जेठ मास में, अच्छो धमका पर गओ
मैं होती तो छाया कर देती।
बंधो-बंधो ऊ कारो बुकरा, जीब निकारें मर गओ,
मैं होती तो सानी धर देती।
तीन दिना से बिकट प्यासो, नटवा टलवा हो गओ,
मैं होती तो उसार कर देती।
बाई कात के खेंचत पानी, हाथ फफोला पर गओ,
मैं होती तो मल्लम भर देती।
ई देश के सिंहासन से, करुना भाव निकर गओ,
मैं होती तो भर देती।
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