सनातन में शूद्र
कम्प्लीट वर्क ऑफ स्वामी विवेकानंद से कुछ उद्धरण
1. CW-4

2. CW-7

3. CW-6

4. CW-6

आदि शंकराचार्य का ब्रह्मसूत्र भाष्य
ऊपर के उद्धरण पढ़कर अभी तक यह तो समझ या ही रहा है की स्वामी विवेकानंद जी ने आदि शंकराचार्य जी के साथ मतभेद प्रकट किए हैं और उनको 'ब्राह्मणवादी' कहा है। अतः यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि शंकराचार्य जी ने ऐसी क्या बात कही और किस संदर्भ में कही कि स्वामी जी जिससे सहमत न हो पाए। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में न केवल जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था को माना है बल्कि उस आधार पर शूद्रों को वेदाध्ययन निषेध बताया है । ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य, अध्याय-1, पाद-3, अपशूद्राधिकरणम्, सूत्र संख्या 34-38 :34. शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि

उसकी (हंस की) अनादरपूर्ण वाणी सुनकर दुखित होकर उसे (जनश्रुति) को आते देख (रैक्व) ने उसे (शूद्र कहकर) संबोधित किया।
राजा जनश्रुति की कथा छान्दोग्य उपनिषद के चतुर्थ अध्याय मे आती है जिसे इस ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। फिर भी संक्षेप मे यहाँ कह देता हूँ। दो हंस आकाश मे उड़ते हुए जा रहे थे । एक ने दूसरे से कहा - "देखो राजा जनश्रुति यहाँ उपस्थित हैं उनके तेज से प्रकाश फैल रहा है । सावधान! इस प्रकाश को स्पर्श मत करना अन्यथा भस्म हो जाओगे ।" ऐसा कथन सुनकर दूसरे हंस ने उत्तर दिया - "कौन है ये ? तुम्हारी बातों से तो ऐसा लगता है जैसे ये गाड़ी वाले रैक्व हों ।" राजा जनश्रुति को हंस की ये बात सुनकर बड़ा दुख हुआ और गाड़ी वाले रैक्व के दर्शन की अभिलाषा जगी। वे रैक्व के पास गए जो एक गाड़ी के नीचे बैठे थे। राजा को लगा रैक्व को शायद कुछ धन की आवश्यकता होगी अतः वे उनके लिए उपहार स्वरूप कुछ गायें, एक हार और एक रथ ले गए। रैक्व से उन्होंने कहा - "ही महात्मन, ये भेंट स्वीकार करें और कृपया मुझे बताएं कि आप किस देव की आराधना करते हैं ?" ऐसा सुनते ही रैक्व बोले - "रे शूद्र! तेरा ये धन तू ही रख" अगले दिन राजा गाएं, हार और रथ के साथ अपनी बेटी भी उपहार मे लाए और रैक्व को उससे विवाह करके उसे स्वीकारने को कहा एवं उनसे दीक्षा देने का अनुरोध किया। उस राजकन्या के मुख को ही विद्याग्रहण का द्वार मानकर रैक्व ने स्वीकार कर लिया ।
अब यहाँ शंकराचार्य कहते हैं कि क्योंकि पहले रैक्व ने उन्हें शूद्र समझा इसलिए शिक्षा देने से मना कर दिया परंतु बाद मे उनके क्षत्रीय होने का ज्ञान होते ही मान गए। अतः यह उदाहरण सिद्ध करता है कि शूद्र को वेदज्ञान का अधिकार नहीं। दूसरा तर्क उन्होंने ये दिया कि तैत्तरिया संहिता में बोला गया है - "यज्ञेऽनवक्लृप्तः" अर्थात शूद्र को यज्ञ करने का अधिकार नहीं [तैत्तरिया संहिता, 8.1.1.6] क्योंकि उसे यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार नहीं।
5. क्षत्रियत्वगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात्
यहाँ इस सूत्र कि व्याख्या में फिर शंकराचार्य कहते हैं कि यद्यपि उनके आचरण से रैक्व ने जनश्रुति को शूद्र कहा परंतु उनके जन्म से क्षत्रीय होने का ज्ञान होते ही उन्हे ज्ञान देने के लिए मान गए । अतः वेद ज्ञान के अधिकार के लिए जन्म से द्विज होना आवश्यक है ।
6. संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च
मुण्डकोपनिषद (मु. उ. 3.2.10), छान्दोग्योपनिषद (छां. उ. 4 .4 .5 ), शतपथ ब्राह्मण (श. ब्रा. 11.5.3.13) से ज्ञात होता है कि गुरु शिष्य को शिक्षा देने से पहले सदा ही उसका उपनयन संस्कार करता है। क्योंकि शूद्र को उपनयन संस्कार निषेध है अतः उसे वेद विद्या भी निषेध है शंकराचार्य जी का ऐसा निष्कर्ष है।
7. तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः

छान्दोग्योपनिषद (छां. उ. 4 .4 .3-5) में सत्यकाम में शूद्रत्व का अभाव सुनिश्चित करने के बाद ही गौतम ने उसका उपनयन संस्कार किया और अपना शिष्य बनाया। आदि शंकराचार्य जी ने

2. CW-7

3. CW-6

4. CW-6

आदि शंकराचार्य का ब्रह्मसूत्र भाष्य
ऊपर के उद्धरण पढ़कर अभी तक यह तो समझ या ही रहा है की स्वामी विवेकानंद जी ने आदि शंकराचार्य जी के साथ मतभेद प्रकट किए हैं और उनको 'ब्राह्मणवादी' कहा है। अतः यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि शंकराचार्य जी ने ऐसी क्या बात कही और किस संदर्भ में कही कि स्वामी जी जिससे सहमत न हो पाए। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में न केवल जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था को माना है बल्कि उस आधार पर शूद्रों को वेदाध्ययन निषेध बताया है । ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य, अध्याय-1, पाद-3, अपशूद्राधिकरणम्, सूत्र संख्या 34-38 :34. शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि
उसकी (हंस की) अनादरपूर्ण वाणी सुनकर दुखित होकर उसे (जनश्रुति) को आते देख (रैक्व) ने उसे (शूद्र कहकर) संबोधित किया।
राजा जनश्रुति की कथा छान्दोग्य उपनिषद के चतुर्थ अध्याय मे आती है जिसे इस ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। फिर भी संक्षेप मे यहाँ कह देता हूँ। दो हंस आकाश मे उड़ते हुए जा रहे थे । एक ने दूसरे से कहा - "देखो राजा जनश्रुति यहाँ उपस्थित हैं उनके तेज से प्रकाश फैल रहा है । सावधान! इस प्रकाश को स्पर्श मत करना अन्यथा भस्म हो जाओगे ।" ऐसा कथन सुनकर दूसरे हंस ने उत्तर दिया - "कौन है ये ? तुम्हारी बातों से तो ऐसा लगता है जैसे ये गाड़ी वाले रैक्व हों ।" राजा जनश्रुति को हंस की ये बात सुनकर बड़ा दुख हुआ और गाड़ी वाले रैक्व के दर्शन की अभिलाषा जगी। वे रैक्व के पास गए जो एक गाड़ी के नीचे बैठे थे। राजा को लगा रैक्व को शायद कुछ धन की आवश्यकता होगी अतः वे उनके लिए उपहार स्वरूप कुछ गायें, एक हार और एक रथ ले गए। रैक्व से उन्होंने कहा - "ही महात्मन, ये भेंट स्वीकार करें और कृपया मुझे बताएं कि आप किस देव की आराधना करते हैं ?" ऐसा सुनते ही रैक्व बोले - "रे शूद्र! तेरा ये धन तू ही रख" अगले दिन राजा गाएं, हार और रथ के साथ अपनी बेटी भी उपहार मे लाए और रैक्व को उससे विवाह करके उसे स्वीकारने को कहा एवं उनसे दीक्षा देने का अनुरोध किया। उस राजकन्या के मुख को ही विद्याग्रहण का द्वार मानकर रैक्व ने स्वीकार कर लिया ।
अब यहाँ शंकराचार्य कहते हैं कि क्योंकि पहले रैक्व ने उन्हें शूद्र समझा इसलिए शिक्षा देने से मना कर दिया परंतु बाद मे उनके क्षत्रीय होने का ज्ञान होते ही मान गए। अतः यह उदाहरण सिद्ध करता है कि शूद्र को वेदज्ञान का अधिकार नहीं। दूसरा तर्क उन्होंने ये दिया कि तैत्तरिया संहिता में बोला गया है - "यज्ञेऽनवक्लृप्तः" अर्थात शूद्र को यज्ञ करने का अधिकार नहीं [तैत्तरिया संहिता, 8.1.1.6] क्योंकि उसे यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार नहीं।
5. क्षत्रियत्वगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात्
यहाँ इस सूत्र कि व्याख्या में फिर शंकराचार्य कहते हैं कि यद्यपि उनके आचरण से रैक्व ने जनश्रुति को शूद्र कहा परंतु उनके जन्म से क्षत्रीय होने का ज्ञान होते ही उन्हे ज्ञान देने के लिए मान गए । अतः वेद ज्ञान के अधिकार के लिए जन्म से द्विज होना आवश्यक है ।6. संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च
मुण्डकोपनिषद (मु. उ. 3.2.10), छान्दोग्योपनिषद (छां. उ. 4 .4 .5 ), शतपथ ब्राह्मण (श. ब्रा. 11.5.3.13) से ज्ञात होता है कि गुरु शिष्य को शिक्षा देने से पहले सदा ही उसका उपनयन संस्कार करता है। क्योंकि शूद्र को उपनयन संस्कार निषेध है अतः उसे वेद विद्या भी निषेध है शंकराचार्य जी का ऐसा निष्कर्ष है।7. तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः

छान्दोग्योपनिषद (छां. उ. 4 .4 .3-5) में सत्यकाम में शूद्रत्व का अभाव सुनिश्चित करने के बाद ही गौतम ने उसका उपनयन संस्कार किया और अपना शिष्य बनाया। आदि शंकराचार्य जी ने
भेद-अभेद
यदि हम अपने परिवेश में नज़र दौड़ाएँ तो विभिन्न प्रकार के रंग, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ, विभिन्न प्रकार के पदार्थ और ऐसी अनंत विभिन्न प्रकार की विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होतीं हैं। ब्रह्माण्ड विभिन्नताओं से भरा हुआ है। और यही कारण है कि यह इतना सुखद, रंगीन एवं मनोरम लगता है। विभिन्नताओं से रहित संसार की कल्पना कर पाना मुश्किल है। मैं आजतक ऐसी कल्पना नहीं कर पाया। अतः विभिन्नताएँ प्रकृति में अनिवार्य भी हैं और वांछित भी। एक इकाई का किसी दूसरी इकाई से भेद उन दोनों इकाइयों को पहचान देता है। यही पहचान हमारे वैयक्तिक अस्तित्व का स्तम्भ है। अगर हम पहचान खो देंगे तो हमारा वैयक्तिक अस्तित्व मिट जायेगा, और सटीक शब्दों में कहूँ तो 'अस्तित्व' का कोई अर्थ नहीं बचेगा। अतः व्यक्ति-व्यक्ति में भेद है इसीलिए उनका व्यक्तिगत अस्तित्व है। तो फिर यहाँ प्रश्न उठता है कि भेद मिटाने की बात क्यों कही जाती है ? क्यों कोई महापुरुष ऐसा कहता है कि रंग,जाति, लिंग आदि का भेद नहीं होना चाहिए ? समरूपता कि बात क्यों की जाती जिसे पाना असंभव-सा है ? पुरुष-स्त्री के शाश्वत भेदों को मानने और पालने वालों को अच्छा नहीं माना जाता। जातिगत भेद को सींचते रहने वालों को क्यों कई लोग आड़े हाथ लेने का प्रयास करते हैं ?
इस विषय पर थोड़ा सोचने पर विचार आता है कि हमें यह समझ लेना चाहिए कि 'भेद' और 'भेदभाव' दो विभिन्न अवधारणाएँ हैं। इन्द्रियगोचर 'भेद' तो अपरिहार्य है और वाँछनीय भी परंतु 'भेदभाव' न तो आवश्यक है और न हि वाँछनीय। शरीर, मन, बुद्धि आदि स्तरों पर 'भेद' का अस्तित्व है और इसलिए हमारा अस्तित्व है क्योंकि हमारे अस्तित्व का भान कराने वाला उपक्रम यानि कि 'अहम्' इन सारे स्तरों से ऊपर है। जैसे-जैसे हम भेदों की भावनाओं को अस्वीकार करते जायेंगे यानि 'भेदभाव' मिटाते जायेंगे वैसे वैसे उत्तरोत्तर अस्तित्व के उच्च स्तरों को प्राप्त होते जायेंगे और जिस दिन 'अहम्' की रेखा को पार कर लिया उस दिन हमारा अस्तित्व मिट जायेगा और हम 'ज्ञानमय' हो जायेंगे; यही आध्यात्म है। यही वो अमूल्य उपहार है जो भारतीय सभ्यता ने विश्व को दिया है।
अतः हमें भेदों को मिटाने का प्रयास करने की वजाय भेदभाव मिटाने का प्रयास करना चाहिए। भेदभाव जिसके साथ होता है उसके लिए तो खतरनाक है ही परंतु उससे भी ज्यादा खतरनाक है उसके लिए जो भेदभाव करता है। इस सत्य को जानते हुए भी हम लोग अहंकार के वशीभूत होकर कई प्रकार के भेदभाव करते हैं। हमारे मानस में ये भेदभाव इस तरह से अंकित हो गए हैं कि कई बार यह कहते हुए भी कि ''मैं भेदभाव नहीं करता'', हम भेदभाव करते रहते हैं और सहते रहते हैं। दो विशिष्ट प्रकार के भेदभावों को मैंने बहुत निकट से देखा है जिनके बारे में बहुत कुछ कह सकता हूँ और कहूँगा भी; परन्तु धीरे-धीरे, समय के साथ। वो दो भेदभाव हैं - जातिवाद और लिंगभेद।
जातिगत भेदभाव भारत के अधिकतर भूभाग में अभी भी फल-फूल रहा है। और मैं तो कहूँगा की अब तो ये और भी खतरनाक होता जा रहा है क्योंकि अब यह संघर्ष के रूप में उभर रहा है। यही बात लिंगभेद के साथ भी है। समरसता संघर्ष और शक्ति केंद्र के परिवर्तित होने से नहीं चित्त के परिवर्तित होने से आएगी। समरसता बाहर नहीं अंदर आनी चाहिए; वही वांछित है। एक उदाहरण देता हूँ। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एक कार्यक्रम चल रहा है, सामाजिक समरसता का। एक स्वयं-सेवक भारत के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले एक तथाकथित दलित युवक से कहता है- "देखिये संघ का केंद्र राष्ट्र है, हम राष्ट्र को बेहतर और बेहतर बनाने की सोच रखते, राष्ट्र के गौरव की सोच रखते हैं। अतः जातिगत भेदभाव जो हमारी सभ्यता को घुन की तरह खाये जा रही है, प्रासंगिग नहीं है और हमें उसका त्याग कर देना चाहिए। इस विचार से हम सामाजिक समरसता के तौर पर आपको वर्षा के लिए होने वाले यज्ञ में आमंत्रित करते हैं पूर्ण अधिकारों के साथ। और हम आपका आवाहन भी करते हैं हमारे साथ जुड़ने का। " युवक को स्वयंसेवक की वो बात बहुत अच्छी लगी। उसने तुरंत प्रश्न किये - "क्या हमें यज्ञ-वेदी तक जाने का अधिकार होगा? क्या हम मंदिर में उतने ही अंदर तक जा सकते हैं जितने कि आप ? क्या हम में से कोई यदि पूजा विधि और मंत्राचार जनता है तो वह पंडित की जगह हवन करा सकता हैं?" स्वयंसेवक हक्का बक्का रह गया। होठों पर जीभ फेरते हुए उसने कुछ कहना चाहा की दलित युवक ने फिर प्रश्न किया - "क्या समरसता का तुम्हारा ये अधिकार रोटी और बेटी के आदान-प्रदान का अधिकार देता है ?" स्वयंसेवक थोड़ा सा तमतमाया फिर बोला - "देखिये भाईसाब ! आपको इसमें बुरा नहीं मानना चाहिए परंतु रोटी-बेटी और हवन वाली बात न हो पायेगी। हंगामा तो आपको यज्ञ-वेदी तक ले जाने में भी होगा परंतु उसकी व्यवस्था मैं करा सकता हूँ लेकिन बाकी चीज़ें संभव नहीं।"
एक बार पुनः उक्त पैराग्राफ पर विचार करें तो हम समझ जायेंगे की किस तरह जातिगत भेदभाव हमारे समाज में भरा हुआ है कि इसको मिटाने का काम करने वाले भी अपने ज़ेहन से मिटाने की हिम्मत नहीं कर पाते। आज भी अगर आप किराये से कमरा लेने जाते हैं तो आपसे पूछते हैं कि आपकी जाति क्या है। और अछूत पाए जाने पर आपको कमरा नहीं दिया जाता। बहुत भटकते देखकर किसी सज्जन को दया आ जाती है और वो आपको किसी हरिजन छात्रावास या हरिजन बस्ती में जाने की सलाह दे देते हैं। इतना सब आज के समय में हो रहा है इस बात को बल देना चाहूँगा क्योंकि आज के युग के लोग इस बात को मान नहीं पाते। मैं ऐसी अनेक इससे भी भयंकर घटनाएं गिना सकता हूँ परंतु इस लेख में नहीं।
स्त्रियों के प्रति भेदभाव भी हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में अपना क्रूर रूप लिए फल-फूल रहा है। बेटियों को पढ़ने के लिए बाहर भेजने में दिक्कत, बहुएँ-बेटियाँ किस प्रकार के कपडे पहनेंगी इस पर तानाशाही, घरों में बहनों से ज्यादा भाइयों को महत्त्व, विद्यालयों में छात्राओं पर बंदिशें, घरेलु हिंसाएँ इत्यादि इत्यादि। और यह सब असलियत है जिसे स्वीकारना पड़ेगा।
हमें भेदों को स्वीकार करते हुए भेदभाव को अस्वीकार करना है जबकि हो उल्टा रहा है। विशेष रूप से हिंदुओं के तो वेद, उपनिषद्, गीता आदि ग्रन्थ भी यही बात करते हैं और हम उनको नज़रअंदाज़ करके उलटा व्यवहार करते हैं। धर्म के ठेकेदार खुद धर्मग्रंथों की उचित शिक्षाओं को नहीं मानते और समाज के साथ साथ स्वयं का भी पतन करने में लगे हैं। यदि स्वयं का भला करना चाहते हो, सत्य का ज्ञान चाहते हो और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ना चाहते हो तो उसका एक ही मंत्र मुझे दृष्टिगोचर होता है - 'विभिन्नताओं को स्वीकार करते हुए भेदभाव को अस्वीकार करते जाओ और एक दिन अहम् को लाँघ कर ज्ञानमय हो जाओगे'
नवोदय विद्यालय - टेढ़ी दृष्टि
जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक ऐसा नाम है जिसने उन्हें आकार दिया। तराश-तराश कर बड़ी सिद्धत से खाका खिंचा और उस पर नक्काशी की और कुम्हार-गड़ा की मिट्टी राख के साथ तपकर सबसे महेंगे बिकने वाले घड़ों में शोभायमान हुई। धूल-धंखड़ से तलाश के कुछ कणों को माणिक्यों जवाहरातों का रूप देने वाली संस्था नवोदय ही है। माटी से निर्मित नवोदय की इन कलाकृतियों में आप ताउम्र माटी की गंध पाएंगे - यही है इस कारीगर की उतकृष्ट कला।
इस तरह ह्रदय सुरम्य सुधियों में विलीन होता जाता है और महिमा-मंडन की अंतहीन सुरमाला हम नवोदयोत्पादों को लपेटती जाती है, लपेटती जाती है। मैं इस क्षेत्र में किसी भी बिंदु पर थकता नहीं। इसी बीच दब जाती हैं कुछ महत्वपूर्ण परंतु कड़वी सुधियाँ जिन्हें हम बाद में भी कभी नही देख पाते और अपने अनुजों के नेत्रों पर भी काली पट्टी जड़ देने के अनवरत प्रयास करते हैं।
१) पता नही क्यों, परंतु कुछ कुलीन अध्यापक/अध्यापिकाएँ नवोदय में पढ़ने वाले बच्चों को उनकी समाज के बच्चों के बराबर का दर्ज़ा नही दे पाते। कितने भी प्रतिभाशाली बच्चे हों, वो रहेंगे गवार और उपेक्षा के पात्र ही।
२) बच्चे विद्यालय की कोई भी कमी की ओर तर्जनी करके इंगित नही कर सकते। अगर आप ऐसा करते पाए गए तो आपको दंगाई घोषित कर दिया जायेगा। छोटी-छोटी बातों पर बाग़ी-घोषित कर के हर उठने वाले फन को कुचल दिया जाता है।
३) बालिकाओं पर तो बंदिशों और तानाशाही का पूरा पर्वत है (हो सकता है ये सिर्फ मेरे नवोदय की समस्या हो क्योंकि मेरा नवोदय बुन्देलखंड में है) कौन से कपडे पहनना है, एक हफ्ते में कितनी बार घर पे बात करनी है, मैदान में एक निर्धारित अतिसूक्ष्म क्षेत्र में ही खेलना है, क्या खेलना है क्या नहीं, परिसर में स्थित दुकान से सामान खरीदने कब जाना है और कितने के झुण्ड में (अब तो शायद दुकान जाने पे रोक लगी है), अपनी सर्वशक्तिमान शिक्षिकाओं के एक एक तानाशाहीक आदेशों का क्रियान्वयन कैसे करना है, इत्यादि इत्यादि ! और अगर किसी लड़के से बात करते पाए गए तो समझो खौलता हुआ सूर्य पृथ्वी पर गिर पड़ेगा।
४) और हाँ, मेस ! वाह क्या कहने ? आपको मुफ्त में भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है, भोजन पे टिपण्णी करने का अधिकार तो आप यहीं खो देते हो। न जाने क्यों प्रशासक लोग मेस-कार्यकर्ताओं को या आपूर्तिकर्ताओं को नहीं कह पाते कि हमारे बच्चों को अमुक दिन टमाटर या आलू सड़े मिले। अमुक दिन का पोहा खाने लायक बनाया ही नही था भाई। अमुक दिन रोटियों में कंकड़ दढ़दढा रहे थे। नही, कभी नही! सबको पता है कि बच्चे कैसा खाना खा रहे हैं फिर भी उन्हें वही खाने पे मजबूर किया जाता है, जैसा की हम पशुओं पे भी नही सोच सकते।बहुत सारे होस्टल्स का खाना बेकार होता है, पर इतना नहीं। अगर इससे भी बत्तर खाना किसी हॉस्टल में है तो आप उसे न के बराबर भुगतान कर रहे हो। नवोदय में तो मेस और विद्यालय की अन्य गतिविधियों के लिए प्रचुर मात्रा में सरकार धन खर्च करती है। उसे कोई मुफ्त न समझे।
ऐसी अनेक यादें हैं जहाँ अन्याय के बड़े क्रूर दर्शन हुए और होते भी हैं। अभी भी बाद तक ये हीनता की ग्रन्थिया पूर्णतया खुल नही पाती। बोलने से पहले सौ बार सोचता हूँ कि मैं सही बोल रहा न ! क्लास में प्रश्न पूछते समय मैं हज़ार बार सोचता था की प्रश्न किस तरह से संभलित वाणी और भाषा में पूंछना है क्योंकि एक बार जो दंगाई होने का ठप्पा लग गया तो समझो आपका पूरा कार्यकाल नरक हो गया। ऐसी यादों के तांते लग जाते हैं। सुरम्य नही, पर हैं तो ये भी यादें ही। इनको भी संजोकर रखा है हमने ठीक उन यादों की तरह जिन्हें सब लोग सबको बताते हैं।
छंद - एक परिचय
छंद क्या है ?
छंद साँचा है, विशेष पैटर्न है, नियमों से नियोजित पद्य रचना है जिसकी पहचान मात्राओं व वर्णों की गिनती, उनका क्रम, लय आदि से की जाती है | उदहारण के लिए दोहा, चौपाई, सोरठा आदि छंद हैं | छंदों के कुछ उदहारण –
अनुष्टुप् छंद
वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि |
मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ || (रामचरितमानस १.१.१)
चौपाई छंद
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।
सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।। (रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड)
दोहा
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पीउ को दोउ भए एक रंग।। (अमीर खुसरो)
कुण्डलिया
पानी बाढै नाव में, घर में बाढै दाम
दोनों हाथ ऊलीचिये यही सयानो काम
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै
परमारथ के काज सीस आगे धरि दीजै
कह गिरधर कविराय बडेन की याही बानी
चलिये चाल सुचाल राखिये अपनो पानी (गिरधर कविराय)
छंद के अंग
छंद के अंग इस प्रकार हैं –
वर्ण एवं मात्रा : लघु वर्ण – ह्रस्व स्वर (अ ,इ ,उ,,ऋ एवं चन्द्र बिंदु)और उसकी मात्रा से युक्त व्यंजन वर्ण को ‘लघु वर्ण’ माना जाता है, उसका चिन्ह एक सीधी पाई (।) मानी जाती है।गुरु वर्ण – दीर्घ स्वर (आ ,ई ,ऊ,ए ,ऐ ,ओ ,औ ,अनुस्वार ,विसर्ग) और उसकी मात्रा से युक्त व्यंजन वर्ण को ‘गुरू वर्ण’ माना जाता है। इसकी दो मात्राएँ गिनी जाती है। इसका चिन्ह (ऽ) यह माना जाता है
चरण: छन्द की प्रत्येक पंक्ति को चरण या पद कहते हैं। निम्नलिखित चौपाई में प्रथम पंक्ति एक चरण और द्वितीय पंक्ति दूसरा चरण हैं-नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
यति: छन्द को पढ़ते समय बीच–बीच में कहीं कुछ रूकना पड़ता हैं, इसी रूकने के स्थान कों गद्य में ‘विराग’ और पद्य में ‘यति’ कहते हैं। जैसे दोहे में १३ वी मात्र पर यति होती है –
रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित इह जगत में, जान पड़े सब कोय।। (रहीमदास)
गति: छन्दोबद्ध रचना को लय में आरोह अवरोह के साथ पढ़ा जाना ही छंद की ‘गति’ है |
तुक: पद्य–रचना में चरणान्त के साम्य को ‘तुक’ कहते हैं। सोरठे में पहले और तीसरे चरण के अन्त में तुक होता है, जबकि दोहे में दूसरे तथा चौथे चरणान्त में तुक होता है –
सोरठा
प्रणवऊँ पवन कुमार, खल बन पावक ग्यान घन |
जासु ह्रदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर || (रामचरितमानस)
दोहा
जाइ दीख रघुबंसमनि, नरपति निपट कुसाजु |
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि, मनहुँ बृद्ध गजराजु || (रामचरितमानस)
6. गण
तीन–तीन वर्णों के समूह को ‘गण’ कहते हैं। वार्णिक छंदों में गणों की गणना की जाती है | गण आठ हैं, इनके नाम, स्वरूप और उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं : –
//नोट : गणों का स्वरुप समझने के लिए सर्वप्रथम मात्राओं की गणना सीखें//
नाम स्वरूप उदाहरण सांकेतिक
१ यगण ।ऽऽ वियोगी य
२ मगण ऽऽऽ मायावी मा
३ तगण ऽऽ। वाचाल ता
४ रगण ऽ।ऽ बालिका रा
५ जगण ।ऽ। सयोग ज
६ भगण ऽ।। शावक भा
७ नगण ।।। कमल न
८ सगण ।।ऽ सरयू स
निम्नांकित सूत्र गणों का स्मरण कराने में सहायक है –
“यमाता राजभान सलगा”
इसके प्रत्येक वर्ण भिन्न–भिन्न गणों के परिचायक है, जिस गण का स्वरूप ज्ञात करना हो उसी का प्रथम वर्ण इसी में खोजकर उसके साथ आगे के दो वर्ण और मिलाइये, फिर तीनों वर्णों के ऊपर लघु–गुरू मात्राओं के चिन्ह लगाकर उसका स्वरूप ज्ञात कर लें। जैसे –
‘रगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘रा’ को लिया फिर उसके आगे वाले ‘ज’ और ‘भा’ वर्णों को मिलाया। इस प्रकार ‘राज भा’ का स्वरूप ‘ऽ।ऽ’ हुआ। यही ‘रगण’ का स्वरूप है।
मात्राएँ गिनना
अ ,इ ,उ,,ऋ एवं चन्द्र बिंदु- ये ह्रस्व स्वर अकेले आएँ या किसी व्यञ्जन के मात्र के रूप में – तब एक मात्रा गिनी जाती है (लघु)
आ ,ई ,ऊ,ए ,ऐ ,ओ ,औ ,अनुस्वार ,विसर्ग- ये दीर्घ स्वर अकेले आएँ या किसी व्यञ्जन के मात्र के रूप में – तब दो मात्राएँ गिनी जाती हैं (गुरु) |
उपर्युक्त दो नियमों के लिए उदाहरण –
राम दूत अतुलित बलधामा । अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।।
S I SI I I I I I I S S S I I SI I I I I I S S
यदि एक ही शब्द में लघु के तुंरत बाद संयुक्ताक्षर (दो या अधिक व्यञ्जन जिनके बीच कोई स्वर न हो) हो तो पहले आनेवाले लघु को गुरु गिना जाता है |
उदहारण –
सज्जन
S I I
छन्द के एक चरण (चौथे या आधे भाग) के अन्त में लघु को गुरु गिना जा सकता हैं यदि चरण पूरा करने के लिए आवश्यकता हो |
छंदों के प्रकार
वार्णिक छंद
वर्णगणना के आधार पर रचा गया छंद वार्णिक छंद कहलाता है ! ये दो प्रकार के होते हैं –
क . साधारण – वे वार्णिक छंद जिनमें 26 वर्ण तक के चरण होते हैं !
ख . दण्डक – 26 से अधिक वर्णों वाले चरण जिस वार्णिक छंद में होते हैं उसे दण्डक कहा जाता है ! घनाक्षरी/कवित्त में 31 वर्ण होते हैं अत: यह दण्डक छंद का उदाहरण है !
कवित्त
वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै………..१६ वर्ण
लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।………..१५ वर्ण
वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,……….१६ वर्ण
वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है।……………१५ वर्ण
वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि,………१६ वर्ण
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।……………१५ वर्ण
आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की,……….१६ वर्ण
सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।………१५ वर्ण
-(कवि घनानंद)
2. मात्रिक छंद
मात्राओं की गणना पर आधारित छंद मात्रिक छंद कहलाते हैं |
उदहारण -दोहा
S I I I I I I S I I I I I I I I I I I S I
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि ।।
I I I I I I I I I I I I I S S I I I I S I
(श्री हनुमान चालीसा)
दोहा
दोहा अत्यंत लोकप्रिय छंद है। कबीर, तुलसी, रहीम, बिहारी इत्यादि कवियों ने इस छंद को आभा प्रदान की। बिहारी सतसई बिहारीलाल की एकमात्र रचना है, इसमें 719 दोहे संकलित हैं। गागर में सागर का अनुपम उदहारण प्रस्तुत करने वाली इस कालजयी कृति के बारे में सच ही कहा गया है –
सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर।।
बिहारी सतसई के दोहे का उदाहरण-
मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोई l
जा तन की झाईं परै श्यामु हरित दुति होई ll 1 ll
भव-बाधा = संसार के कष्ट, जन्ममरण का दु:ख
नागरि = सुचतुरा
झाईं = छाया
हरित = हरी
दुति = द्युति, चमक
वही चतुरी राधिका मेरी सांसारिक बाधाएँ हरें-नष्ट करें, जिनके (गोरे) शरीर की छाया पड़ने से (साँवले) कृष्ण की द्युति हरी हो जाती है l
नोट – नीले और पीले रंग के संयोग से हरा रंग बनता है l कृष्ण के अंग का रंग नीला और राधिका का कांचन-वर्ण (पीला) – दोनों के मिलने से ‘हरे’ प्रफुल्लता की सृष्टि हुई. राधिका से मिलते ही श्रीकृष्ण खिल उठते थे l
दोहे की संरचना
दोहा मात्रिक छंद है अर्थात इसमें मात्राओं की गणना की जाती है। दोहे के पहले एवं तीसरे चरण में १३ मात्राएँ जबकि दूसरे और चौथे चरण में ११ मात्राएँ होती हैं। चरणान्त में यति होती है। विषम चरणों के अंत में ‘जगण’ नहीं आना चाहिए। सम चरणों में तुक होती है, तथा सम चरणों के अंत में लघु वर्ण होना चाहिए।
S I I I I I I S I I I I I I I I I I I S I
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउं रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि ।।
I I I I I I I I I I I I I S S I I I I S I
–श्री हनुमान चालीसा
दोहों के कुछ और उदहारण-
१) परमा खड़ा बज़ार में, ताकै चारों ओर।
ये नर लड़की ताक के, कभी न होता बोर।
२) यों परमा सुख होत हैं, स्टॉकर के संग।
हर फोटो देखत ह्रदय, बाजत ढोल मृदंग।
३) साईं इतना दीजिये, जासै कुटुम दिखाय।
मैं भी सिंगल ना रहूँ, खर्चा भी बच जाय।
४) इन्फी प्रोफाइल देख के दिया स्टॉकर रोय।
उसकी नज़र के सामने, सिंगल बची न कोय।
५) सिंगल देखन मैं चला, सिंगल न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपनो, मुझ-सा सिंगल न कोय।
६) बंदी ढूंढत जुग गया, फिरा न मनका फेर।
परमा जो अब ढूंढ़ ली, गई कहीं मुख फेर।
७) स्टॉक कर-कर जग मुआ, कमिटेड हुआ न कोय।
दुइ आखर ‘डूड’ का, पढ़े सो कमिटेड होय।
८) ‘परमा ‘वृक्ष -कुटुंब की ,बेटी है हरियाल ।
पतझड़ बाद जो न रहे ,सूनो रूख बिहाल ।–परमानंद
रोला
रोला दोहे का उल्टा होता है। इसमें विषम चरणों में ११ एवं सम चरणों में १३ मात्राएँ होती हैं। इतना ही नहीं दोहे के विपरीत इसमें सम चरणों के अंत में गुरु वर्ण होता है।
नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
–मैथिलीशरण गुप्त
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं।
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है।
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३
–– मैथिलीशरण गुप्त
सोरठा
सोरठा रोला जैसा ही होता है, बस अंतर इतना है कि सोरठे में विषम चरणों में तुक होती है सम चरणों में तुक होना जरुरी नहीं है। दूसरा अंतर ये है कि सोरठे में सम चरणों के अंत में लघु वर्ण आता है। बाकी संरचना समान ही है; विषम चरणों में ११ मात्राएँ तथा सम चरणों १३।
SI SI I I SI I S I I I I I S I I I
कुंद इंदु सम देह , उमा रमन करुनायतन ।
जाहि दीन पर नेह , करहु कृपा मर्दन मयन ॥
S I S I I I S I I I I I S S I I I I I
–रामचरितमानस
सोरठे के कुछ और उदहारण-
जुर-मिल तीनो भाय ,करी विदा दुई बहिना ।
सुमरी शरद माय ,कछु भार घटा कंधे से ।।१।।
भैया ठाडे तीन ,साथ में स्यामाबाई ।
भीगे नयन मलीन ,दूर जात दुई बहना ।।२।।
भई ओझल आँखिन सु ,बरात की बैलगाड़ी ।
उड़ गई सुगंध चन्दन सु ,आभा उडी सोने की ।।३।।
–परमानंद
कुण्डलिया
जिस तरह साँप कुंडली मार के बैठता है (उसकी पूँछ मुह पे खतम होती है) उसी तरह कुण्डलिया भी जिस शब्द से शुरू होती है उसी पे ख़तम होती है। इसी कारण से इसे कुण्डलिया कहते हैं।
सांई अपने भ्रात को ,कबहुं न दीजै त्रास ।
पलक दूरि नहिं कीजिए , सदा राखिए पास ॥
सदा राखिए पास , त्रास कबहुं नहिं दीजै ।
त्रास दियौ लंकेश ताहि की गति सुनि लीजै ॥
कह गिरिधर कविराय राम सौं मिलिगौ जाई ।
पाय विभीषण राज लंकपति बाज्यौ सांई ॥
-कवि गिरधर
पंडित अति सिगरी पुरी, मनहु गिरा गति गूढ़।
सिंहन युत जनु चंडिका, मोहति मूड़ अमूढ़।।
मोहति मूढ़ अमूढ़ देव संगऽदिति सी सोहै।
सब शृंगार सदेह, मनो रतिमन्मथ मोहै।।
सब शृंगार सदेह सकल सुख सुखमा मंडित।
मनो शची विधि रची विविध बिधि बरणत पंडित
-रामचंद्रिका/बालकाण्ड (कवि केशवदास)
कुण्डलिया की संरचना
कुण्डलिया में छः पंक्तियाँ होती हैं। पहली दो पंक्तियाँ दोहा होती हैं। बीच की दो पंक्तियाँ रोला होती हैं। रोले की शुरुआत उस्सी चरण से होती है जिस चरण में दोहे का अंत होता है अर्थात दोहे का चौथा चरण रोले का पहला चरण बन जाता है। अंतिम दो पंक्तियाँ रोले जैसी ही होती है पर इनमें सम चरणों के अंत केन गुरु वर्ण होना जरुरी नहीं होता।
सोना लादन पिय गए, सूना करि गए देस।
सोना मिले न पिय मिले, रूपा ह्वै गए केस॥ (दोहा)
रूपा ह्वै गए केस, रोर रंग रूप गंवावा।
सेजन को बिसराम, पिया बिन कबहुं न पावा॥ (रोला)
कह ‘गिरिधर कविराय लोन बिन सबै अलोना।
बहुरि पिया घर आव, कहा करिहौ लै सोना॥ (रोला)
–गिरधर कविराय
ग्राम “मढैया” सुख बसा ,उर्मिल नद के पार ।
जम्बू दीपे भरत खंडे ,आजादी के बाद।। (दोहा)
आजादी के बाद ,सब नीको चले कामा।
हरे खेत झूमते , इ सुखद सुरीलो धामा।। (रोला)
वामन क्षत्रीय वैश्य सब सुख से करते काम ।
एक झलकिया देख लो चलो मढैया ग्राम।। (रोला नहीं, रोले जैसा पर सम चरणों के अंत में गुरु नहीं)
–परमानंद😛
बोलनि ही औरैं कछू, रसिक सभा की मानि।
मतिवारे समझै नहीं, मतवारे लैं जानि।।(दोहा)
मतवारे लैं जानि आन कौं वस्तु न सूझै।
ज्यौ गूंगे को सैन कोउ गूंगो ही बूझै॥(रोला)
भीजि रहे गुरु कृपा, बचन रस गागरि ढोलनि।
तनक सुनत गरि जात सयानप अलबल बोलनि॥ (रोला नहीं, रोले जैसा पर सम चरणों के अंत में गुरु नहीं)
–कवि नागरीदास
कुछ और कुण्डलियाँ –
बहना याद सनेह की ,असुअन में न ढार।
ले जाना इसको घरे ,आँखिन में सम्हार।
आँखिन में सम्हार ,मोरी माने न माने।
अमर रहे बस प्रेम छद्म बांकी ढह जाने।
‘परमा’ कहे सब के ,हिरदे में ही रहना।
जीवन में न छोड़ना ,प्रेम का दामन बहना।
धरना देते द्वार पर, बैठे पीकर भांग।
सारे सिंगल कर रहे, आरक्षण की मांग।
आरक्षण की मांग, कमिटेड की सुन लीजै।
मारे इन्फी फाइट, चान्स उसी को दीजै।
कह ‘परमा’ कविराय, भला पिछड़ों का करना।
आरक्षण दे सफल, बनाना इनका धरना।
या माया का जाल है ,करे चुटीले घात।
‘परमा’ तुम मूरख भये ,फिर फिर फसने जात।
फिर फिर फसने जात , मोह के फांस निराले।
करे किसी से दूर , किसी को गले लगा ले।
देख मान सनमान , तु फूला नहीं समाया।
आँख सुबुधि की खोल , तज दे मोह या माया।
आगे सीखेंगे कुछ और रोचक एवं सुन्दर छंद.………नमस्ते
-परमानंद
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