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सच्ची बात न फेंकूँ लबरी। मोखां बता गओ तो खबरी।
एक कलक्टर, सुभाव नोनो। कोमल गात, हृदय सलोनों।
जन मानस की विथा जानवे। सासन की दुर्दसा जानवे।
करो कलेऊ बड़े सबेरा। निकर परे नहीं करी कुबेरा।
पोंच गए एक गाँव समीपा। पहर दूसरो घाम असीमा।
लटकत तारे हर घर मइयां। सूनो लगत कोउ लो नइयाँ।
दीखे बालक चुनत निबौरी। जुर-मिल सबरे करत ठिठोली।
एक बालिका उम्मर छोटी। सीस धरें घट पैरें धोती।
रूख नीम को सुन्दर छाया। एक डुकरिया सेज बनाया।
सोई डुकरिया भूम कठोरा। पास धरो जल भरो कटोरा।
गाड़ी रोक दई जिलधीसा। नैनन गॉगल टोपी शीशा।
बारे बूढ़े सब जुर आए। तबईं कलक्टर शीश नवाए।
कैसो आओ मोई मड़ईया। नौने उन्ना, लगे पड़इया।
सब कमावे कढ़ गए दिल्ली। तुम कां बेटा मारत किल्ली?
जिलाधीश मन में मुस्कानो। हाथ जोर कें बोलन लागो।
माई कलक्टर मैं सरकारी। देख रहा यह विपदा भारी।
ड्यूटी अपनी देने आया। सच्ची खबरें लेने आया।
बंदोबस्त होगा राशन का। नौकर हूँ मैं भी शासन का।
बेटा सुन ले बात बताऊँ। तोरो भलो तोय समझाऊँ।
बात मान दस गुनो कमाहै। ईकी लूटे ऊकी खाहै।
हम जैसन पे रौब जमाहै। बैठ कें कुर्सी हुकम चलाहै।
होत कमाई ईमे भारी। छोड़ कलक्टर बन पटवारी।
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