बुधवार, 17 जून 2015

आसुन आँस गई कतकी

विशेष :- मालती सवैया नामक छंद का प्रयोग जिसमें सात भगण (S I I) एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं।


आसुन आँस गई कतकी, रब ने सजनी अब बादर फारे।
जात किते अब खात किते, सनतान किते अब पालत बारे।
सूद बढ़ै दिन रात अरी, जनु चाँद बढ़ै रजनी उजियारे।
बीज बहाय लिए बरखा, सब नास कियो हरि पालनहारे।


आसुन = इस वर्ष, आँस गई = खटक गई, कतकी = खरीफ की फसल, किते = कहाँ, सनतान = संतान, बारे = बालक 

मंगलवार, 16 जून 2015

हिम के पथरा

विशेष :- मालती सवैया नामक छंद का प्रयोग जिसमे सात भगण (S I I) एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं। 

बादर से हिम के पथरा, बरसे हिरदे जब मार कटारी। 
चारउ ओर भई चपटी, फसलें झकझोर सपट कर डारी। 
ढोरन गातन खून बहै, कछु चोटन से दिहिया तज डारी। 
थारन मूड़ ढके दुबके, 'परमा' अब रूठ गओ गिरधारी। 


बादर = बादल, पथरा = पत्थर, चारउ = चारों, ढोरन = पशुधन के, गातन = अंगों में, चोटन = चोटों से, दिहिया = शरीर/देह, थारन = थालियों से, मूड़ = सिर

सोमवार, 15 जून 2015

सजना बरयाने

पृष्ठभूमि:- बुंदेलखंड के उस मजदूर परिवार की कल्पना करें जिसका मुखिया शराब पीता है और यहीं से जन्म लेती हैं गरीबी, भूख और घरेलू हिंसा जैसी गंभीर समस्याएँ।
विशेष:- प्रस्तुत छंद मालती सवैया है जिसके प्रत्येक चरण में सात भगण(S I I) एवं अंत में दो गुरु वर्ण होते हैं।

खोरन ठोकर खात फिरै, ढुलकै-लुढकै नहि होस ठिकाने।
रंजित नैनन खून चढ़ो, पतलून धरे सब कीच भिड़ाने।
मारत, डारत तेल सखी, नहि लाज रखै सजना बरयाने।
देख सराब खराब बला, 'परमा' अनवास न भौत खटाने।


खोरन = गलियन, भिड़ाने = लथपथ, बरयाने = पागल हो जाना, अनवास = उपयोग करना/सेवन करना, खटाने = जिन्दा रहना

रविवार, 14 जून 2015

बेलापुर वाली

"नई बहु जा कैसी आई, हरपरसाद की घरवाली।
आड़ करे न मरजादा, मौ काढ़े बेलापुर वाली।
आदी राते हरपरसाद खावै, पैला खा ले बेलापुर वाली।
खात में सबरी रोटी छू लई, बड़ी असद्दन बेलापुर वाली।
गोबर करे से हाथ बसावै, रगड़ धोये बेलापुर वाली।
सेम्पुअन से केस धुव रये, बड़ी बनत बेलापुर वाली।
जेठ ससुर से सूदी बोलत, का है करैयाँ बेलापुर वाली।
बउएं बिलुर गईं पढ़ लिख कें. सो बिगरी बेलापुर वाली।"
- बउअन पे जो इतने बंधन, का करे बेलापुर वाली।
को 'परमा' बरबाद हो रओ, जो समाज या बेलापुर वाली।

                                                                         -परमानंद
नई = नई (नया), नईं = नहीं, जा = यह, मौ = मुंह, असद्दन = अशुद्ध, बिलुर/बिगर = बिगड़, बउएं/बउअन = बहुएँ/ बहुओं, 

शनिवार, 13 जून 2015

असाढ़ की पैली बुंदियाँ

पैली बेर को ऐसो बरसो,
सबरो जिया जुड़ा गओ तरसो।
बीज करो सरजू की अम्मा,
भ्याने नईं तो बै दें परसों।
भैसें बाँध देव बहार खों,
जुड़ा जान दो उने भीतर सों।
पर को बीज अब धरो कां है,
डेओढ़ लगी न, बीते बरसों।
तिली मूंग कतकी ने खा लए,
चैती लील गई सब सरसों।
हर साल सो हर न रावै,
हाथ जोर कै दो हर सों।
                         
                             -परमानंद

पैली बेर = पहली बार, जुड़ा = ठंडक, भ्याने = कल सुबह, बै = बुआई, कां = कहाँ, कतकी = खरीफ की फसल, चैती = रबी की फसल, हर = प्रत्येक/हल/हरि (ईश्वर), रावै = रहे 

शुक्रवार, 12 जून 2015

सुख

नोट : कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय की प्रथम वल्ली में नचिकेता द्वारा यमराज को दिए गए उत्तर से प्रेरित।
Note : Inspired by Nachiketa's answer to Yamraj, Kathopanishad,Chapter-1, Valli-1

सुख तो भइया दूर के बाजे, दूरई दूर पुसावै रे।
इनके पाछू लग कें देखो, हाथ न तनकउ आवै रे।
बर्रोलन में ज्यों बर्रोली, त्यों जग सत्य कहावै रे।
माया की जा सुखद बर्रोली, जो न साँच दिखावै रे।
सुख के साधन जोर जोर कें, हमें न कभउ अघाने रे।
पल में सबई अलोप हो जाने, जबई गटा मुंद जाने रे।

                                                                 -परमानंद


पुसावै = पसंद आना, तनकउ = तनिक, बर्रोली = सपना, साँच = सच, कभउ = कभी, अघाने = तृप्त होना, अलोप = गायब, गटा = नेत्र, मुंद जाने = बंद हो जायेंगे

गुरुवार, 11 जून 2015

बड़े पावने भौत नसाने

ठेका वारी दारू पीके,
बड़े पावने भौत नसाने।
डरे रात कउ नाली मेंहा,
होंस कछु न रात ठिकाने।
हम तो सांसू कै-कै हारे,
बात सुने न एकउ माने।
बिटिये मारे, बार उखारे,
कभउँ पकर उन्ना दे ताने।
रकम कमाबे की कोउ काबे,
सौ-सौ हीला करे बहाने।
बड़े दुखन से बिटिया रै रई,
सांसू एक न देत उराने।
निभा-निभा के सबरो सै रई,
बड़े पावने भौत नसाने।

                            -परमानंद

पावने = दामाद, कउ = कहीं, मेंहा = में, भौत = बहुत, नसाने = बिगड़े, सांसू = सच्ची, कै = कह, रै = रह, सै = सह (सहना)