गुरुवार, 4 जून 2015

लोक भजन

पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।

नाते घरी भरे के लाने,
जे संग तोरे नई जाने;
आँखी मिंचत नज़र नई आने, माया को सबरो जंजाल।
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल। 

जो नित-नित होत पुरानो,
अरे,मरम  न तेने जानो;
पिंजरा काये तोए मिठानो, जी में है नइयां सर-स्वाद।
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।

भीतर बैठी जोन चिरैया,
उको कछु भरोसो नइयां;
'परमा' मानत काये नइयां, भज ले बृजमोहन बृजलाल। 
पिंजरा धरो इतइ रए जाने, पंछी उड़ जाने तत्काल।

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